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पतंग का साइंस : हवा में उड़ती टोपी से हुआ था पतंग का आविष्कार, पतंगबाजी के लिए 6 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चलना जरूरी

  • पतंगों का इस्तेमाल कभी मौसम का हाल जानने के लिए भी किया जाता था
  • राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में बड़े स्तर पर मनाए जाते हैं काइट फेस्टिवल

पतंग उड़ाने और पेंच लड़ाने का भी अपना विज्ञान है। इसे उड़ाने जा रहे हैं तो पहले इसका विज्ञान भी समझ लीजिए। पतंग का सीधा कनेक्शन हवा से है। चाहते हैं कि पतंग आसमान में गोते खाए तो 6 से 20 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चलनी जरूरी है। हवा की स्पीड इससे कम या अधिक होने पर पतंगबाजी करना मुश्किल हो सकता है।

विज्ञान कहता है, पतंग की हवा में उड़ने की क्षमता उसकी बनावट और कन्ने बांधने के तरीके पर भी निर्भर है। आमतौर पर साधारण आकार की पतंग तब उड़ती है, जब उसकी निचली सतह की ओर से हवा का दबाव पड़ता है।

आज मकर संक्रांति है। इस मौके पर जानिए दुनिया में कहां-कहां त्योहारों पर पतंग उड़ाने का रिवाज है, पेंच लड़ाने के लिए कौन सी बातें ध्यान रखें और पतंग जिंदगी के कौन से सबक सिखाती है…

चीन से चली पतंग दुनियाभर में छाई
पतंग का आविष्कार चीन के शानडोंग में हुआ। शुरुआत कुछ यूं हुई कि खेत में एक चीनी किसान अपनी टोपी को हवा में उड़ने से बचाने के लिए एक रस्सी से बांध कर रखता था। जब हवा चलती थी तो उड़ती हुई टोपी का नजारा किसान को दिलचस्प लगता था। इसी के साथ ही चीन में पतंग की शुरुआत हुई।

कुछ इतिहासकारों का मत है कि 5वीं शताब्दी में चीनी दार्शनिक मोझी और लू-बान ने बांस के कागज की मदद से पतंग का आविष्कार किया था और यहीं से पतंगबाजी की शुरुआत हुई।

कभी संदेश भेजने के लिए भी होता था पतंग का प्रयोग
549 ईसवीं से कागज की पतंगों को उड़ाया जाने लगा था, क्योंकि उस समय पतंगों को संदेश भेजने के रूप में इस्तेमाल किया गया था। ज्यादातर लोगों का मानना है कि चीनी यात्री हीनयान और ह्वैन सांग पतंग को भारत में लाए थे। वायुमंडल में हवा के तापमान, दबाव, आर्द्रता, वेग और दिशा के अध्ययन के लिए पहले पतंग का ही प्रयोग किया जाता था।

1898 से 1933 तक मौसम ब्यूरो ने मौसम के अध्ययन के लिए पतंग केंद्र बनाए हुए थे। यहां से मौसम का अनुमान लगाने की युक्तियों से लैस बॉक्स पतंगें उड़ा कर मौसम का पता लगाते थे।

पतंगबाजी का शौक है तो कभी यहां आइए
पतंग कारोबार के लिए गुजरात और उत्तर प्रदेश के कई जिले मशहूर हैं। बरेली, अलीगढ़, रामपुर, मुरादाबाद और लखनऊ में तैयार होने वाला मांझा और पतंग राजस्थान समेत कई राज्यों में भी सप्लाई किया जाता है।
इसी तरह गुजरात में वडोदरा, सूरत, राजकोट और अहमदाबाद पतंग के बड़े बाजार हैं और यहां मनाया जाने वाला उत्तरायण पर्व दुनियाभर में मशहूर है। देश में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात में मकर संक्रांति के मौके पर बड़े स्तर पर काइट फेस्टिवल होते हैं।

चीन से लेकर साउथ अफ्रीका तक कम नहीं पतंगबाजी का जुनून कम नहीं

  • ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा पतंगोत्सव फेस्टिवल ऑफ विंड्स के नाम से सिडनी में हर साल सितंबर में सेलिब्रेट किया जाता है।
  • चीन के वेईफांग शहर में हर साल अप्रैल में काइट फेस्टिवल आयोजित होता है। यहां मान्यता है कि ऊंची पतंग को देखने से नजर अच्छी रहती है।
  • जापान में हर साल मई के पहले सप्ताह में हमामात्सु के शिजुका प्रान्त में पतंगोत्सव होता है। यहां मानते हैं कि पतंग उड़ाने से देवता प्रसन्न होते हैं।
  • भारत में खासतौर मकर संक्रांति के मौके पर पतंग उड़ाने का रिवाज है। जनवरी के पहले सप्ताह में अहमदाबाद और जयपुर में भारत के सबसे बड़े काइट फेस्टिवल आयोजित किए जाते हैं।
  • ब्रिटेन में हर साल अगस्त के दूसरे सप्ताह में पोर्ट्समाउथ इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है। यहां डिजाइनर से लेकर 3डी पतंगों के लिए लोग जुटते हैं।
  • हर साल 1 नवंबर को ग्वाटेमाला में काइट्स ऑफ सुपेंगो के नाम से पतंग उत्सव मनाया जाता है। जिसमें 15-20 मीटर चौड़ी पतंगे उड़ाई जाती हैं।
  • इंडोनेशिया के बाली काइट फेस्टिवल में 4-10 मीटर चौड़ी और 100 मीटर की पूंछ वाली पतंगे उड़ाई जाती हैं। यह अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में सेलिब्रेट किया जाता है।
  • साउथ अफ्रीका के केपटाउन में जनवरी के दूसरे हफ्ते में इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल सेलिब्रेट किया जाता है।
  • अमेरिका में द जिल्कर काइट फेस्टिवल सेलिब्रेट किया जाता है। हर मार्च में यहां म्यूजिक कॉन्सर्ट से लेकर हर उम्र वर्ग के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।
  • इटली में सर्बिया इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल हर साल अप्रैल में मनाया जाता है।

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