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बात बराबरी की:अब औरतों की बारी है; हमें मर्दों को समझाना होगा कि हम न तो उनकी जिम्मेदारी हैं और न कोई विपदा, हम केवल साथी हैं

मध्यप्रदेश में 15 दिनों के भीतर पतियों की क्रूरता की तीसरी वारदात सामने आई। ताजा घटना बैतूल की है, जिसमें पति ने सोती हुई पत्नी पर कुल्हाड़ी के वार से उसका एक हाथ पूरी तरह से अलग कर दिया, जबकि दूसरे हाथ की उंगलियां काट दी। अस्पताल में लंबी-चौड़ी टीम ने सर्जरी कर पीड़िता की जान बचाई। मिलती-जुलती तीन अलग-अलग घटनाएं हैं, जहां शक के मारे शौहरों ने अपनी बीवियों के हाथ-पैर काट डाले। ये घटनाएं कम, ऐलान ज्यादा हैं कि औरतों, अपनी हद न भूलो, वर्ना तुम्हारा हाल भी उस चौपाए जैसा होगा, जिसे जीभ की लज्जत के लिए काट दिया जाता है।

अंगभंग का ये चलन ताजा नहीं, बल्कि काफी पुराना है, जिसकी जड़ें ठहरती हैं 17वीं सदी में। तब औरत अपने पति की जायदाद की फेहरिस्त में एक खास सामान हुआ करती थी। खास इसलिए कि संपत्ति की सूची में शामिल बाकी तमाम सामान निर्जीव होते, जबकि पत्नी अकेली सजीव। वो अपनी कमनीयता से थके-हारे या ऊबे पति का मन बहलाव कर सकती थी। गरीब हुई तो खेत-कारखानों में जुत सकती थी। बावर्चीखाने में दावतें पका सकती थी। या फिर आर्म कैंडी की तरह पार्टियों में पति की बांहों में सज सकती थी, लेकिन पत्नी-नामक इस जायदाद का एक और फायदा भी था। इस्तेमाल करते हुए मियां का जी उकता जाए तो वो उसे बेच भी सकता था।

तब ब्रिटेन समेत दुनिया के कई हिस्सों में एक बाजार लगता था, जहां पति अपनी पत्नियों की बोली लगाते थे। ये बाजार हमारे मंगल-इतवारी बाजार जैसे ही होते, जहां फल-नमक की बजाय औरतों के ढेर हुआ करते। विवाहित-अविवाहित, जवान-बूढ़े, अघाए-तिगाए- हर तरह के मर्द खरीदार होते। पहले पूरा बाजार छानते, फिर रुककर किसी ढेरी में से एक औरत उठाई, घुमा-फिराकर उसके बेदाग-ठोस होने की तसल्ली की और फिर मोलभाव कर औरत खरीद ली।

सामान में कोई खोट दिखे तो दाम में कमी की भी गुंजाइश होती। विक्टोरिन काल में तलाक की प्रक्रिया जटिल और समय लेने वाली हुआ करती थी। ऐसे में वाइफ सेलिंग बेहतर रास्ता था। कानूनी मान्यता न होने के बाद भी पत्नियों की खरीद-फरोख्त तब आम घटना थी। वक्त आगे निकल गया, लेकिन मर्दवादी सोच वहीं अटकी है।

17वीं सदी की मानसिकता का सबूत साल 2016 में भी मिला था, जब एक ऑनलाइन खरीद-फरोख्त प्लेटफॉर्म ईबे (eBay) पर एक पति ने अपनी पत्नी को बेचने की पहल की। उसने अपनी बीवी की ‘कंडीशन’ का खुलासा करते हुए बताया कि उसका शरीर और चमक-दमक अब भी ठीकठाक है और वो रसोई के भी काम कर लेती है। इस विज्ञापन पर नीलामी शुरू होकर सांय से 65,000 डॉलर तक पहुंच गई, तब जाकर कंपनी का इस पर ध्यान जा सका।

आनन-फानन में विज्ञापन हटा दिया गया। विज्ञापन भले ही किसी खुशदिल पति ने इतवार की दोपहर ऊब मिटाने के लिए डाला हो, लेकिन तब भी सोचने की बात है कि उसके दिमाग में पत्नी को बेचने का ख्याल आया, घर के किसी फर्नीचर या कालीन को नहीं। इससे भी खतरनाक बात ये है कि विज्ञापन पर कीमतें भी लगने लगीं। या शायद ये खरीदार भी हंसोड़ लोग होंगे, जो कपड़ों और इलेक्ट्रॉनिक सामानों की खरीद के बीच छोटा-सा विराम ले रहे हों।

एक जनाब अपनी पत्नी को ऑनलाइन बेच रहे हैं तो दूसरे महाशय उसे अपने पास बुलाने के लिए कोर्ट तक पहुंच गए। वे चाहते थे कि बेदम मार-पिटाई से ‘रूठकर’ मायके गई उनकी पत्नी वापस लौटे और घर संभाले। गोरखपुर कोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट (HMA) के हवाले से इस पर हामी भी दे दी, लेकिन पत्नी तब भी अड़ी रही। आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। वहां पुराने फैसले पर लताड़ लगाते हुए कोर्ट ने निचली कोर्ट समेत पति से पूछा- क्या पत्नी कोई जायदाद या गुलाम है जो आदेश देकर उसे तुम्हें या किसी को सौंपा जा सके, या ऐसी जगह भेजा जा सके, जहां वो नहीं जाना चाहती! ये मामला सबसे ताजा है, इसी साल फरवरी महीने का।

इधर शारीरिक वर्जिश के शौकीन मर्द बीच-बीच में अपनी पत्नियों पर भी कसरत के पैंतरे आजमाते रहते हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) का डाटा बताता है कि 15 से 49 साल की एक तिहाई औरतें यौन हिंसा घरों के भीतर ही झेलीं होती हैं। शादीशुदा महिलाओं के हाल और खराब हैं। डाटा के मुताबिक हर 5 में से 1 विवाहिता कभी न कभी पति की मारपीट या यौन-हिंसा का शिकार होती है।

मारपीट की किस्म के बारे में भी NFHS ने पड़ताल की और पाया कि बीवियों को उनकी जगह दिखाने के लिए पुरुषों का सबसे पसंदीदा हथियार थप्पड़ है। 34% औरतों ने सर्वे में ये बात मानी कि पति उन पर अक्सर हाथ उठाते हैं। धक्का देना, बाल खींचना जैसे ज्यादा चटखारेदार करतब भी हैं, लेकिन उनका डेटा जरा कम है। सर्वे में ये भी देखा गया कि केवल 1% महिलाओं ने शारीरिक या किसी भी किस्म की हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई। यानी असल आंकड़े जमीन में कई परत नीचे दबे हैं।

लगभग पांच महीने पहले हरियाणा में एक लड़की को एक युवक ने इसलिए गोली मार दी क्योंकि उसने युवक का प्रेम-निवेदन खारिज कर दिया था। लड़की पढ़ना चाहती थी, और युवक शादी करके घर बसाना। अब भला युवक के उदार सपने के आगे लड़की के मामूली सपने की क्या बिसात! चुनांचे लड़के ने भरे बाजार उसे उसकी जगह दिखा दी। यहां लड़की और लड़का शादीशुदा नहीं थे, लेकिन यहां भी वही बात थी- मालिकाना हक की।

कोई भी मर्द, खासकर अंग्रेजीदां मर्द इस चर्चा के छिड़ते ही दाएं-बाएं झांकने लगता है, या अपने बड़प्पन की उजबक सी मिसालें देने लगता है। वो खुली जबान से कभी औरत को अपनी जायदाद नहीं कहता। सच ही है। उसे वाकई इसका अंदाजा नहीं। ये तो बस एक आनुवांशिक बीमारी है, जो बेहद चोरी से एक से दूसरी पीढ़ी में जा रही है। और उसकी सोच में घुन लगा रही है, इतने चुपके से कि उसे खबर तक नहीं। तभी तो स्त्री नाम की प्रॉपर्टी पर सेंध लगती देख बौखलाया मर्द कभी फरसा उठा हाथ-पैर काट देता है तो कभी सोशल मीडिया पर ट्रोल करने में जुट जाता है।

अब बारी औरतों की है। चाहे जिस भाषा में सही, हमें मर्दों को समझाना होगा कि हमारा पूरापन उनके अस्तित्व पर खतरा नहीं। हम कोई ट्रॉफी नहीं, जिसे हाथों में थामने को वे पूरा जोर लगा दें। हम न तो उनकी जिम्मेदारी हैं और न कोई विपदा। हम केवल साथी हैं, जो साथ चलते हुए अपनी मर्जी का जीवन चुनने को आजाद हैं।

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